दोस्तों हिन्दी-गाँव में आपका स्वागत है, मैं यह blog क्यूँ लिख रहा हूँ ?यह blog हिन्दी में क्यूँ है? (यह सब असला बारूद में आने वाली किश्तों के लिए बचा के रख रहा हूँ :)
उम्मीद है की यह सफर अच्छा रहेगा तो इस blog में आप को क्या पढने को मिलेगा,यह तो लाख रुपये का प्रसन है भाया|(यहाँ पूर्ण विराम होना चाहिए या विस्मयादी वोधक इसे लेकर मैं असमंजस में हूँ)
आपको यहाँ पर शायद कुछ अच्छे offer मिल सकते है (हां भाई आपने सही सुना क्यूंकि हर लेखक चाहे वो तुत्पुन्जिया ही क्यूँ न हो अपने विनय पाठक को कुछ न कुछ बेचने के जुगाड़ में है),तो लो भइया हम भी shutter ऊपर करते है और बहुनी का इंतज़ार करते है (यहाँ बहुनी से मेरा मतलब "बिक्री बट्टे" वाली बहुनी से है न की "बहुनी ओ बहुनी बबुआ ओ बबुआ" से है)
हिन्दी गाँव आपका इस्तेकबाल करता है (इस्तेकबाल इक़बाल का पर्यायवाची है)|किसी भले मानुस ने कहा है की जब बन्दे के पास keyboard आ जाता है और वोह कुछ भी गटर शटर छपने लगता है तो समझ लेना चाहिए की web २.० आ चुका है|जैसे की हमारे अरबी भाइयों ने चीनियों से कागज़ बनने की कला सीख कर विज्ञान एवं कला के छेत्र में नए आयाम स्थापित(यह आज तक स्टाइल का शब्द प्रयोग है) किए वैसे ही इस वेब २.० ने हर चिरकुट को orkut पे पेज दिया ,यह इसी मायाजाल की महिमा(चौधरी नही!) है की ४ बाई की खोली(यह दूसरा ४ कहाँ गया) में रहने वाले गनपत के पास भी myspace में बहुत space है|तो भइया लाग लपेट और अंधा धुंध के बीच(अक्सा नही!) हमऊ मैदान में उतर आए...
आज के लिए इतना ही जय वीर हनुमान और जो जन जहाँ से आए है तह को करो पयान !
आपका ही,
विक्लिपथ
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